Home छत्तीसगढ़ माओवाद के साये से पुलिस की वर्दी तक: अर्जुन की प्रेरक कहानी

माओवाद के साये से पुलिस की वर्दी तक: अर्जुन की प्रेरक कहानी

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bplnews24:

रायपुर

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मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय की संवेदनशील पहल और वन एवं जिले के प्रभारी मंत्री  केदार कश्यप के मार्गदर्शन में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा के साथ विकास और पुनर्वास को भी प्राथमिकता दी जा रही है। आत्मसमर्पण करने वाले लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़कर सम्मानजनक जीवन का अवसर देने के प्रयासों से अनेक जिंदगियां बदल रही हैं। बीजापुर के डीआरजी में पदस्थ सब इंस्पेक्टर अर्जुन की कहानी इसका प्रेरक उदाहरण है।

माओवाद के साये से पुलिस की वर्दी तक: अर्जुन की प्रेरक कहानी

*बचपन में माओवादी संगठन से जुड़ने को हुआ मजबूर*

अर्जुन ने बताया कि माओवादी हिंसा के दौर में ग्रामीण परिवारों पर संगठन से जुड़ने का दबाव रहता था। इसी भय और दबाव के कारण उन्हें भी बचपन में माओवादी संगठन में शामिल होना पड़ा। समय के साथ उन्होंने माओवादी गतिविधियों और हिंसक विचारधारा को करीब से देखा और उनका मोहभंग हो गया।

इसके बाद उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया। पुनर्वास का लाभ मिलने के बाद उन्हें पुलिस विभाग में सेवा का अवसर मिला।

*पुनर्वास से मिली नई राह, मेहनत से बने सब इंस्पेक्टर*

अर्जुन ने बताया कि आत्मसमर्पण के बाद उन्हें नई जिंदगी शुरू करने का अवसर मिला। उन्होंने पुलिस विभाग में जिम्मेदारी संभाली और अपनी मेहनत तथा बेहतर कार्य के बल पर आगे बढ़ते गए। शुरुआत में उन्होंने गोपनीय सैनिक के रूप में सेवा की और बाद में पदोन्नति प्राप्त करते हुए सब इंस्पेक्टर बने।

आज अर्जुन उसी क्षेत्र में पुलिस की वर्दी पहनकर कानून और संविधान की रक्षा तथा आम नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनका जीवन बताता है कि सही अवसर और पुनर्वास का सहारा मिलने पर हिंसा के रास्ते से लौटकर सम्मानजनक जीवन की शुरुआत की जा सकती है।

*चेन्नई के मीडिया प्रतिनिधियों ने जाना सुरक्षा बलों का अनुभव*

पीआईबी के डायरेक्टर  अरुण कुमार पी. के नेतृत्व में चेन्नई से आए मीडिया प्रतिनिधियों ने 17 अगस्त को बीजापुर प्रवास के दौरान पुलिस अधीक्षक कार्यालय में डीआरजी और एसटीएफ के जवानों से चर्चा की। इस दौरान जवानों ने बस्तर में माओवाद के प्रभाव, नक्सली हिंसा, सुरक्षा अभियानों, आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास तथा नक्सल मुक्त बीजापुर में हो रहे बदलावों के बारे में अपने अनुभव साझा किए।

*सुरक्षा के साथ विकास और पुनर्वास पर जोर*

डीएसपी  विनीत साहू ने मीडिया प्रतिनिधियों को नक्सल विरोधी अभियानों और सुरक्षा बलों के सामने आने वाली चुनौतियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि नक्सलवाद के खिलाफ रणनीति में केवल सुरक्षा कार्रवाई ही नहीं, बल्कि ग्रामीणों का विश्वास मजबूत करना, आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास को प्रोत्साहित करना और विकास कार्यों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना भी शामिल है।

डीआरजी और एसटीएफ के जवानों ने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में लगातार अपनी जिम्मेदारी निभाई है। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के साथ अब विकास कार्यों को भी गति मिल रही है।

*नक्सल मुक्त बीजापुर में दिख रहा बदलाव*

31 मार्च 2026 के बाद नक्सल मुक्त बीजापुर में बदलाव की नई तस्वीर सामने आ रही है। जिन क्षेत्रों में कभी माओवादी हिंसा के कारण सामान्य जनजीवन और विकास कार्य प्रभावित होते थे, वहां अब सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कार्यों को गति मिल रही है।

सुरक्षा बलों के जवानों ने बताया कि आज ग्रामीणों में विश्वास बढ़ रहा है और विकास गतिविधियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं। यह बदलाव सुरक्षा, पुनर्वास और विकास के समन्वित प्रयासों का परिणाम है।

*अर्जुन की कहानी बनी बदलाव की मिसाल*

अर्जुन की कहानी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बदलाव की मानवीय तस्वीर सामने लाती है। जिस व्यक्ति को कभी परिस्थितियों और दबाव के कारण माओवादी संगठन से जुड़ना पड़ा, वही आज पुलिस की वर्दी पहनकर कानून, संविधान और समाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभा रहा है।

मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व और वन एवं जिले के प्रभारी मंत्री  केदार कश्यप के मार्गदर्शन में आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास की नीति के माध्यम से लोगों को हिंसा छोड़कर विकास और सम्मान की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास जारी हैं। अर्जुन का सफर इसी बदलाव का प्रेरक उदाहरण है। माओवाद के साये से निकलकर वर्दी की जिम्मेदारी तक पहुंचने का सफर।

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