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भारतीय रेलवे ने कर दिखाया कुछ ऐसा कि बड़े-बड़े देश रह गए पीछे, जानें कहां मारी बाजी

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नई दिल्ली
क्या नई बनी कारों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में सड़क परिवहन का दबदबा कम हो रहा है? क्या अब ज्यादा कारें रेल से जा रही हैं? जवाब है, हां। पिछले 11 सालों में भारतीय रेलवे ने कारों को ढोने में जबरदस्त तरक्की की है। वित्त वर्ष 2013-14 में जितनी कारें बनती थीं, उनमें से सिर्फ 1.5% ही रेल से जाती थीं। लेकिन 2024-25 में यह आंकड़ा बढ़कर 24% से भी ज्यादा हो गया है। इस मामले में भारतीय रेलवे ने कई बड़े-बड़े देशों को पीछे छोड़ दिया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक रेलवे के अधिकारियों ने बताया कि पिछले वित्तीय वर्ष में देश में कुल 50.6 लाख कारें बनीं। इनमें से लगभग 12.5 लाख कारों को ट्रेनों से भेजा गया। एक बड़े रेलवे अधिकारी ने कहा, 'सिर्फ पिछले चार सालों में, ट्रेनों से जाने वाली कारों की संख्या 14.7% से बढ़कर लगभग 24.5% हो गई है। हमें उम्मीद है कि यह सिलसिला जारी रहेगा। क्योंकि कार बनाने वाली कंपनियों को रेल ज्यादा सुविधाजनक, किफायती और पर्यावरण के लिए बेहतर लगती है।'

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सिर्फ एक देश है आगे

ट्रेन के जरिए कार ढोने के मामले में भारत ने चीन और जर्मनी समेत दुनिया के कई बड़े-बड़े देशों को पीछे छोड़ दिया है। पूरी दुनिया में ट्रेनों से कारों को ढोने के मामले में भारत दूसरे नंबर पर है। पहले नंबर पर अमेरिका है, जहां लगभग 75 लाख कारें रेल से जाती हैं। जर्मनी लगभग 6 लाख कारों के साथ तीसरे नंबर पर है।

कितना पड़ा फर्क?

उद्योग के सूत्रों का कहना है कि ट्रकों से 600 किमी से ज्यादा दूर जाने वाली कारों की संख्या लगभग आधी हो गई है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि रेलवे इस काम में ज्यादा हिस्सा पाना चाहता है। एक लॉजिस्टिक्स कंपनी के बड़े अधिकारी ने कहा कि इससे सड़क परिवहन उद्योग को बहुत नुकसान हुआ है, जो ज्यादा लोगों को नौकरी देता है। रेलवे ज्यादा रैक उपलब्ध करा रहा है और कारोबार बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन भी दे रहा है।

कैसे आया उछाल?

रेल मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि ट्रेनों से कारों को ढोने में यह उछाल लगातार कोशिशों की वजह से आया है। 2013-14 में इस काम के लिए सिर्फ 10 रैक थे। साल 2021 तक इनकी संख्या 29 हो गई और अब यह 170 है। उन्होंने बताया कि 2024-25 में कारों को ढोने के लिए कुल 7,578 चक्कर लगाए गए।

एसयूवी भी हुई शामिल

दो साल पहले रेलवे ने वैगनों (wagons) को इस तरह से डिजाइन किया कि उनमें SUV जैसी बड़ी गाड़ियां भी दोनों डेक पर आ सकें। पहले एक रैक में 27 वैगन होते थे, जिनमें सिर्फ 135 एसयूवी आ पाती थीं। लेकिन अब इनकी संख्या दोगुनी होकर 270 हो गई है। इससे रेलवे एक बार में ज्यादा गाड़ियां ले जा पाता है।

रेलवे की इस तरक्की से सड़क परिवहन कंपनियों को जरूर थोड़ी परेशानी हो रही होगी। लेकिन इससे पर्यावरण को फायदा हो रहा है, क्योंकि ट्रेनें ट्रकों के मुकाबले कम प्रदूषण करती हैं। साथ ही कार बनाने वाली कंपनियों को भी गाड़ियां भेजने का एक सस्ता और आसान तरीका मिल गया है।

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