राष्ट्रीय

PM मोदी आज करेंगे आसियान-इंडिया वर्चुअल समिट की संयुक्त रूप से अध्यक्षता  

नई दिल्ली  
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वियतनाम के प्रधानमंत्री न्गुयेन शुआन फुक आज आसियान-इंडिया वर्चुअल समिट की संयुक्त रूप से अध्यक्षता करेंगे. इस दौरान कई प्रमुख मसलों के साथ ही भारत और आसियान के बीच कारोबार बढ़ाने पर भी बात हो सकती है. आइए इस अवसर पर जानते हैं कि भारत और आसियान के बीच कारोबार कितना है और दोनों के बीच प्रमुख मसले क्या हैं? 

क्या है आसियान 
आसियान (Asean) का पूर्ण रूप है एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशन्स. यह दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का एक संगठन है. आसियान के 10 सदस्य देशों में ब्रुनेई, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, लाओ पीडीआर, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाइलैंड और  वियतनाम शामिल हैं.  दक्षिण-पूर्व ए​शियाई देशों के आर्थिक, राजनीतिक, सुरक्षा, सामाजिक विषयों पर चर्चा के लिए हर दो साल पर आसियान देशों का सम्मेलन होता है. आसियान का 37वां सम्मेलन इस बार वर्चुअल तरीके से ही 12 से 15 नवंबर तक हो रहा है.इस साल आसियान की अध्यक्षता वियतनाम कर रहा है. 

भारत है डायलॉग पार्टनर 
भारत सहित दस देश आसियान के डायलॉग पार्टनर हैं. भारत के अलावा इनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, रूस, अमेरिका और यूरोपीय संघ शामिल हैं. इस साल वियतनाम ने सभी 10 डायलॉग पार्टनर्स को अपने सालाना सम्मेलन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है. इसके पहले ही आसियान और भारत के बीच गुरुवार को यानी आज एक वर्चुअल समिट का आयोजन किया गया है. 
 विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस दौरान भारत-आसियान के बीच कनेक्टिविटी, समुद्री सहयोग, व्यापार एवं वाणिज्य, शिक्षा और क्षमता निर्माण पर चर्चा होगी. कोविड के दौर में अर्थव्यवस्था में सुधार के उपाय, क्षेत्रीय सहयोग, अंतरराष्ट्रीय ​विकास आदि की भी इस दौरान चर्चा हो सकती है. इसके पहले नवंबर 2019 में बैंकॉक में आयो​जित पिछले आसियान सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल हुए थे. इस साल आसियान-इंडिया प्लान ऑफ एक्शन (2021-2025) को स्वीकार किया गया है. पिछले साल भारत ने आसियान के स्टूडेंट्स के लिए 1,000 डॉक्टरल फेलोशिप की शुरुआत की थी. कोरोना संकट और चीन की बढ़ती आक्रामकता को देखते हुए भारत-आसियान की यह बैठक काफी महत्वपूर्ण है. 

RCEP स्वीकार नहीं 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' पर जोर दिया है, इसे देखते हुए भारत लगातार आसियान से अपने रिश्ते बेहतर करने की कोशिश करता रहा है. लेकिन पिछले साल आसियान द्वारा प्रस्तावित आरसीईपी व्यापार समझौते में भारत शामिल नहीं हुआ था. भारत का कहना था कि यह उसके राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं है. रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) समझौता के प्रस्ताव के अनुसार 10 आसियान देशों (ब्रुनेई, इंडोनेशिया, कंबोडिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, विएतनाम) और 6 अन्य देशों ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया के बीच एक मुक्त व्यापार समझौता होता और सभी 16 देश एक-दूसरे को व्यापार में टैक्स में कटौती समेत तमाम आर्थिक छूट देते. पर भारत के अलग हो जाने से इस समझौते पर दस्तखत नहीं हो पाया.  

भारत क्यों हुआ आरसीईपी से अलग 
असल में आरसीईपी में शामिल होने के लिए भारत को आसियान देशों, जापान, दक्षिण कोरिया से आने वाले 90 फीसदी वस्तुओं पर से टैरिफ हटाना था. इसके अलावा, चीन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से 74 फीसदी सामान टैरिफ फ्री करना था. इसलिए भारत को डर था कि उसका बाजार चीन के सस्ते माल से पट जाएगा. इसी तरह न्यूजीलैंड के डेयरी प्रोडक्ट के भारतीय बाजार में पट जाने से किसानों के हितों को काफी नुकसान पहुंचने की आशंका थी. 

वाणिज्य मंत्री ने दिये सकारात्मक संकेत 
अगस्त महीने में आयोजित आसियान देशों के साथ मंत्रिस्तरीय वर्चुअल समिट में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था, 'विभिन्न कारणों से भारत और आसियान अपने पूर्ण कारोबारी संभावनाओं का दोहन करने में सक्षम नहीं हो पाये हैं. लेकिन अब यह समय आ गया है कि व्यापार का विस्तार करने के लिए खुला रवैया अपनाया जाए और सभी देशों एवं कारोबार की चिंताओं का समाधान करने के साथ ही मतभेदों को हल किया जाए.'

भारत-आसियान मुक्त व्यापार
भारत और आसियान के बीच वस्तुओं में व्यापार को लेकर मुक्त व्यापार समझौता पर हस्ताक्षर के 11 साल हो गये हैं. साल 2009 में हुए इस समझौते से भारत ने क्या पाया है और क्या खोया है, अब इसकी समीक्षा की बात की जा रही है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, भारत और आसियान समूह के बीच वर्ष 2016-17 में 71.57 अरब, 2017-18 में 81.33 अरब, 2018-19 में 96.79 अरब और 2019-20 में 86.86 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार था. लेकिन आसियान के साथ भारत का व्यापारिक घाटा 2015-16 से लगातार बढ़ता रहा है. वर्ष 2016-17 में भारत को 9.65 अरब डॉलर, 2017-18 में 12.93 अरब डॉलर, 2018-19 में 21.85 और 2019-20 में 23.88 अरब डॉलर के व्यापार घाटे का सामना करना पड़ा. 

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