मध्य प्रदेशराज्य

2020 में जनता ने उलट दिया 2018 का जनादेश, नहीं चला कांग्रेस का मैनेजमेंट

भोपाल
उपचुनाव में कांग्रेस की हार के बाद भोपाल से लेकर दिल्ली तक पार्टी संगठन इसके कारण तलाश करने में जुट गया है। स्थानीय नेताओं से लेकर कार्यकर्ता भी हार के कारण जानने का प्रयास कर रहे हैं। कांग्रेस की हार में कई कारण निकल कर सामने आ रहे हैं। जिसमें संगठन का मिस मैनेजमेंट, उम्मीदवार के चयन के लिए करवाए गए सर्वे भी सवालों से घिर गए हैं। कांग्रेस ‘गद्दार ’शब्द को लेकर उपचुनाव लड़ने जा रही थी, उसे ही वह मूल मुद्दा नहीं बना सकी।

किसान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दिनेश गुर्जर ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भूखा-नंगा बोलकर भाजपा को हावी होने का मौका दिया। इस टिप्पणी को भाजपा ने इतनी तेजी से उठाया कि कांग्रेस का मुख्य मुद्दा इस टिप्पणी के आगे कमजोर हो गया। इसके बाद कमलनाथ ने डबरा में ‘आइटम’शब्द का इस्तेमाल कर भाजपा को दूसरा मौका दिया।

उपचुनाव का ऐलान होने से पहले ही कांग्रेस ने उम्मीदवारों का ऐलान करना शुरू कर दिया था। पहली बार कांग्रेस ने उपचुनाव होने से कई दिनों पहले उम्मीदवारों को काम करने के लिए हरी झंडी दे दी थी। इसके बाद कांग्रेस ने तय किया कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ हर सीट पर जाएंगे। कमलनाथ हर सीट पर सभा करने भी पहुंचे, लेकिन उन्होंने किसी भी दिन दो से ज्यादा सभाएं नहीं की। जबकि भाजपा की ओर से शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक-एक दिन में पांच-पांच सभाएं तक ली। कमलनाथ ने लगभग 50 सभाएं की, जबकि शिवराज सिंह चौहान और सिंधिया ने मिलकर 150 के लगभग सभाएं की।

कांग्रेस ने दावा किया था कि वह सर्वे के आधार पर उम्मीदवारों का चयन कर रही है। उम्मीदवारों के चयन को लेकर चार बार सर्वे कराया गया। इसके बाद भी कांग्रेस के 19 उम्मीदवार हार गए। इसमें से सांची, सांवेर, बमौरी में कांग्रेस उम्मीदवारों ने हार का रिकॉर्ड बना दिया। ऐसे में कांग्रेस के इस सर्वे को लेकर कार्यकर्ताओं से लेकर कई नेता भी सवाल उठा रहे हैं।

कांग्रेस ने सांवेर प्रेम चंद्र गुड्डू, सुरखी पारुल साहू , सुमावली अजब सिंह कुशवाह और ग्वालियर पूर्व सतीश सिकरवार के साथ ही डबरा से सुरेश राजे और बमौरी से केएल अग्रवाल को भाजपा से तोड़कर कांग्रेस में शामिल किया। इनमें से तीन ही सफल हो सके। इनके अलावा अम्बाह से सत्य प्रकाश सखवार और करैरा से प्रागीलाल जाटव बसपा छोड़कर कांग्रेस में आए थे। इसमें से भी प्रागीलाल जाटव ही चुनाव जीत सके।

प्रदेश की राजनीति के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ होगा जब कांग्रेस को एक मात्र नेता के दम पर इतना बड़ा चुनाव लड़ना पड़ा। प्रदेश में कांग्रेस में हमेशा कांग्रेस के तीन से चार चेहरे वोट मांगने निकलते रहे हैं, लेकिन इस बार सिर्फ कमलनाथ के चेहरे को आगे कर उन्हें ही कांग्रेस ने आगे रखा। वे चुनाव प्रचार और सभाएं करने में अकेल पड़ गए थे। दिग्विजय सिंह सभाएं करने के लिए अंतिम दिनों में मैदान में आए थे।

दिग्विजय सिंह अपने गृह जिले गुना जिले की एक मात्र सीट पर हो रहे उपचुनाव में जीत नहीं दिला सके। गुना जिले की बमौरी सीट पर उपचुनाव थे। यहां पर कांग्रेस की बड़ी हार हुई है। वहीं कभी गुना जिला का हिस्सा रहे अशोकनगर और मुंगावली सीट भी पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह कांग्रेस को जीत नहीं दिला सके। हालांकि उनके प्रभाव वाली सीट ब्यावरा में वे कांग्रेस को विजयी बनवाने में सफल रहे।

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