अंतरराष्ट्रीय

लंबे समय तक रहता है कोरोना वायरस का असर: अमेरिकी वैज्ञानिकों की स्टडी 

वॉशिंगटन 
वैज्ञानिकों ने अमेरिका में 1,600 से अधिक कोविड-19 रोगियों के डेटा का अध्ययन किया और पाया कि बीमारी का दीर्घकालिक प्रभाव होता है। अनुसंधानकर्ताओं में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के अनुसंधानकर्ता भी शामिल थे। उन्होंने मिशिगन के 38 अस्पतालों में भर्ती 1,648 कोविड-19 रोगियों के डेटा का विश्लेषण किया और पाया कि उनमें से 398 की अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान मौत हो गई तथा 1,250 जीवित बच गए। अनुसंधानकर्ताओं ने 488 मरीजों का उनके अस्पताल में भर्ती होने के लगभग 60 दिन बाद साक्षात्कार किया। इनमें से 39 प्रतिशत से अधिक मरीजों ने कहा कि वे अस्पताल से छुट्टी मिलने के दो महीने बाद भी अभी तक सामान्य गतिविधियां शुरू नहीं कर पाए हैं। अध्ययन रिपोर्ट पत्रिका 'एनल्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन में प्रकाशित हुई है।

दूसरी ओर, शोधार्थियों ने सूती कपड़े का ऐसा पुनः इस्तेमाल किया जाने वाला मास्क विकसित किया है जो एक घंटे सूरज की रोशनी में रहने पर 99.99 प्रतिशत जीवाणु और वायरस को मार सकता है। अलग अलग तरह के कपड़ों से बनते वाले मास्क खांसते और छींकते वक्त निकलने वाली बूंदों को रोकते हैं जिससे कोविड-19 समेत अन्य बीमारियों के प्रसार को कम करने में मदद मिल सकती है। ''एसीएस अप्लाइड मटेरियल एंड इंटरफेसेज'' जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, मास्क पर लगे जीवाणु और वायरस संक्रामक हो सकते हैं। अमेरिका में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने एक नया सूती कपड़ा विकसित किया है जो सूरज की रोशनी में आने पर ''प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन स्पाइजेस'' (आरओएस) छोड़ती है जो कपड़े पर लगे सूक्ष्म विषाणुओं को मार देती है और यह धोने योग्य, पुनः इस्तेमाल योग्य और लगाने के लिए सुरक्षित रहता है।

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