राजनीति

तेजस्वी पर भारी ओवैसी फैक्टर, अभी बिहार को नीतीश की जरूरत

  पटना
बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम (Bihar Election Result 2020) ने तमाम एग्जिट पोल्स को धता बताते हुए महागठबंधन की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। पर इन चुनावों में सबसे तगड़ा झटका तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) के नेतृत्व वाले आरजेडी को लगा है। अबतक मुस्लिम वोटबैंक को अपने साथ जोड़े रखने वाली पार्टी को सीमांचल इलाके में असदुद्दीन औवेसी (Asaduddin Owaisi) की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने जोर का झटका दिया है। ओवैसी की पार्टी ने इस इलाके की 5 सीटों पर कब्जा जमाया है। इस जीत के साथ ही ओवैसी के हैदराबाद स्थित घर पर उनके समर्थकों ने जमकर आतिशबाजी की।

AIMIM का जलवा, आरजेडी हुई फेल
AIMIM ने बिहार चुनाव में 20 उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें से 14 कैंडिडेट सीमांचल के इलाके में थे। ओवैसी की पार्टी ने इनमें से 5 सीटें जीती और बाकी के 15 सीटों पर वोट काटकर आरजेडी को तगड़ा नुकसान पहुंचाया। AIMIM ने अमौर, कोचाधमान, बहादुरगंज, बैसी और जोकीहाट सीट पर बड़ी जीत दर्ज की।
 

    बिहार की जो पॉलिटिक्स है वो मल्टीलेटरल से खत्म होकर बाइपोल होने जा रही है। हो सकता है कि अगला जो विधानसभा चुनाव हो उसमें भारतीय जनता पार्टी का सीधा मुकाबला जेडीयू से हो। चुनाव को लेकर दो निष्कर्ष सामने हैं। पहला यह कि तेजस्वी यादव बिहार चुनाव में स्ट्रांग लीडर के रूप में उभर के सामने आए हैं, मैं सिर्फ इस चुनाव की बात कर रहा हूं। अगर सीट वाइज़ देखा जाए, कद के हिसाब से देखें तो निश्चित तौर पर नीतीश कुमार एक जीते हुए गठबंधन के नेता होंगे, उनको शायद एनडीए के विधायक दल का नेता भी चुना जाए और वो सीएम भी बन जाएं लेकिन बड़े नेता के तौर पर मौजूदगी दर्ज कराई है तेजस्वी यादव ने। कहेंगे कैसे..

    आज से पांच साल पहले जब तेजस्वी यादव को लालू यादव ने एक तरीके से प्रोजेक्ट करना शुरू किया था, तब एक रैली हुई थी अगस्त 2017 में पटना के गांधी मैदान में, तब वहां पर सीधे तौर पर तेजस्वी ने शंखनाद किया। उस रैली में तेजस्वी यादव में जो एक पॉलिटिकल विट होता है, तंज करना होता है, एक अटैकिंग मोड होता है, उसकी उनमें कहीं न कहीं कमी थी, या यूं कहें वो पॉलिटिक्स में अंडर ग्रेजुएट थे। आज इस चुनाव के बाद हमें ये पता चल रहा है कि वो पोस्ट ग्रेजुएट हो गए हैं। तेजस्वी के लिए अच्छी बात यह है कि वो अभी मात्र 31 साल के ही हैं। उन्होंने कल ही अपना जन्मदिन मनाया है। आने वाले पांच साल के बाद, इस हार के बावजूद वो एक मजूबत स्थिति में होंगे।

    जब चुनाव की घोषणा हो रही थी तब ऐसी स्थिति थी कि तेजस्वी यादव, राहुल गांधी चुनाव आयोग के पास गए और कहा कि अभी कोरोना चल रहा है तो इलेक्शन मत कराओ, बाद में करा लेना जब कोरोना ठीक हो जाए। निश्चित तौर पर जो अपने को कमजोर मानता है, वो इस तरह की बातें करता है। एनडीए ने कभी नहीं कहा कि हम चुनाव से भाग रहे हैं। लेकिन पिछले 40 दिन में तेजस्वी यादव ने किस तरह से हवा का रुख अपनी तरफ मोड़ा, नया एजेंडा सामने रखा, यूथ से कनेक्ट करने की कोशिश की, बेरोजगारी को बड़ा मुद्दा बनाया, जातिवाद के दलदल में फंसी बिहार की राजनीति जो एजेंडा विहीन राजनीति है, उसमें एजेंडी की राजनीति जिसकी कल्पना लालू यादव की पार्टी से नहीं करते थे, उसकी शुरुआत तेजस्वी यादव ने की। इसके लिए तेजस्वी यादव ने किसको छाया में रखा- अपने पिता को, मां को, बहन को अपने भाई को। तेजस्वी ने बड़ी रणनीति बनाई- आरजेडी के किसी पोस्टर में लालू यादव, राबड़ी देवी और उनकी बहन नहीं दिखी। जब ये नहीं दिखते थे तो एनडीए के नेताओं को लगता था कि अगर ये होते तो ज्यादा अटैक करने का उनको मौका मिलता। लेकिन तेजस्वी यादव ने जिस तरीके से अपने रणनीतिकारों की टोली बनाई और काम किया, आज की तारीख में इसके लिए तेजस्वी यादव को शाबाशी देनी होगी।

    तेजस्वी यादव यह मैसेज देने में पूरी तरह से कामयाब रहे कि लालू के कथित 'जंगलराज' से उनकी राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। वो 31 साल के बिहार के नौजवान है, चाहे वो नौवीं पास हों या फेल हों लेकिन उनके पास एक विजन है एक विजन है कि यहां हम रोजगार पैदा करेंगे, यहां हम इंडस्ट्री लाएंगे। दूसरी बात सामाजिक न्याय की राजनीति जो लालू यादव ने शुरू की और उसे घिस दिया क्योंकि उसके आगे वो नहीं निकल सके। दबे कुचले, गरीब-गुरबे बूथ तक पहुंचे, उनमें आत्मसम्मान लौटा, इसके लिए लालू यादव की तारीफ करनी पड़ेगी। लेकिन उन्होंने क्या किया, बिहार को जातीय राजनीति और हिंसा में झोंक कर रख दिया। तेजस्वी ने क्या किया, उसकी आंच उन तक न पहुंचे इसके लिए कई बार जनता से माफी मांगी। और यह एक बहुत बड़ा जेस्चर था।

AIMIM की जीत पर कार्यकर्ताओं ने हैदराबाद में की आतिशबाजी
बिहार चुनाव में AIMIM की जीत पर ओवैसी के हैदराबाद आवास पर पार्टी कार्यकर्ताओं ने जमकर आतिशबाजी की है। अभी तक चुनावों में वोटकटवा कहे जाने वाले ओवैसी की पार्टी ने 5 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया है। सीमांचल में उसकी जीत ने आरजेडी के लिए बड़ा खतरा बन गई है।

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