राजनीति

कन्हैया कुमार की रैलियों में दिख रहा उत्साह, फिर कुछ सीटों के लिए ही क्यों कर रहे प्रचार?

बेगूसराय
कन्हैया कुमार बिहार चुनाव में प्रचार तो कर रहे हैं, लेकिन इस बात की चर्चा है कि महागठबंधन उन्हें स्टार प्रचारक के तौर पर इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहा है. कन्हैया फिलहाल सिर्फ बेगूसराय की विधानसभाओं में या उसके आसपास की कुछ विधानसभाओं में ही प्रचार करने के लिए जा रहे हैं. आजतक की टीम जब उनकी सभाओं में पहुंची तो लोगों में कन्हैया को लेकर काफी उत्साह देखने को मिला. कन्हैया जैसे ही मंच पर आते हैं उससे पहले ही भीड़ में लोगों के सेल्फी खिंचवाने का सिलसिला शुरू हो जाता है. कई कार्यकर्ता सेल्फी के लिए मंच तक पहुंच जाते हैं. कन्हैया कुमार भाषण में इसका जिक्र करते हुए कहते हैं कि युवाओं में एक बड़ी गंदी आदत है. नेता जब हेलिकॉप्टर से लैंड करता है तो लोग उसे देखने आते हैं. सेल्फी खींचते हैं और घर जाकर सो जाते हैं. लेकिन इस बार मैं कार्यकर्ताओं से कहना चाहता हूं कि घर जाकर सोना नहीं है. बल्कि अपने सभी जान पहचान के लोगों को फोन करना है ताकि वह वोट देने के लिए बड़ी संख्या में आएं और बदलाव का माध्यम बन सकें.

कन्हैया अपने भाषण में दुष्यंत कुमार की गजल को दोहराते हैं-  कैसे कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,  गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं. अब तो तालाब का पानी बदल दो यारों, यह कमल के फूल कुम्लहलाने लगे हैं. बात जब एक बुजुर्ग उम्मीदवार की चलती है तो वह युवाओं को समझाते हैं कि अभी बिहार का ऑपरेशन करना जरूरी है और जब ऑपरेशन किया जाता है तो मरीज को खिचड़ी खिलाई जाती है और उसमें पुराना चावल ही काम आता है.  युवाओं को जोड़ने के लिए कन्हैया अपने भाषण में बेरोजगारी और पलायन रोकने में सरकार की नाकामी की बात करते हैं. इसके साथ ही वह युवाओं को नसीहत देते हैं कि जोश में होश नहीं खोना है. गुस्से में सवाल तो पूछना है लेकिन विरोधियों के प्रति चुनाव में गुस्सा, नफरत, भेदभाव और ध्रुवीकरण से बचना है. कन्हैया जानते हैं कि महागठबंधन में सबसे बड़ा डर उससे जुड़े युवाओं का अति उत्साह हो सकता है, जिसमें विपक्ष मौका तलाश सकता है.  

बेरोजगारी के मुद्दे पर कन्हैया बोलते हैं कि बेरोजगारी में भोपाल, इंदौर, पुणे और अन्य जगहों पर बिहार के लोगों को अपमानित किया जाता है. वह अपमान गुस्सा तो पैदा करता है लेकिन उसका इस्तेमाल दिल दुखाने के लिए नहीं बल्कि सरकार बदलने के लिए करना है. कन्हैया लोगों से दोनों हाथ उठाकर संकल्प करवाते हैं.  भाषण के दौरान कन्हैया अपनी मां का जिक्र करते हुए कहते हैं कि बिहार में रोजगार पैदा करना तो प्राथमिकता है ही, लेकिन मेरी मां आंगनबाड़ी में काम करती है और अगर सरकार बनी तो मानदेय बढ़ाएंगे.  राजस्थान के कोटा स्थित कोचिंग इंस्टिट्यूट पर तंज कसते हुए कन्हैया कहते हैं, " पढ़ने वाला बिहारी कोटा,  पढ़ाने वाला बिहारी कोटा,  तो कोटा में कोचिंग क्यों?" जब सबसे ज्यादा आईएएस और इंजीनियर बिहार से ही बनते हैं और बिहार में प्रतिभा की कमी नहीं है तो फिर बिहार में काम क्यों नहीं कर सकते? हालांकि बिहार की सियासत में यह भी चर्चा है कि जब कन्हैया की रैली में इतने समर्थक दिख रहे हैं तो फिर उन्हें कुछ विधानसभा सीटों की ही जिम्मेदारी क्यों सौंपी गई है. क्या तेजस्वी उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखते हैं और इसलिए उन्हें स्टार प्रचारक के तौर पर नहीं उतारा गया? हालांकि कन्हैया ने आजतक से बात करते हुए किसी तरह की प्रतियोगिता की बात से इंकार किया है.  

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