मध्य प्रदेशराज्य

उपचुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना

भोपाल
मध्य प्रदेश में संपन्न हुए उपचुनाव में सभी 28 सीटों पर जीत का दावा करने वाली कांग्रेस  के प्रदर्शन को राजनीति के जानकार किसी भी सूरत में संतोषजनक नहीं मान रहे हैं। 28 में से 27 सीट तो ऐसी थी जिसमें कमलनाथ सरकार के समय कांग्रेस के विधायक थे। किंतु इन 27 सीटों में से मात्र 8 सीटों पर ही कांग्रेस पुनः कब्जा कर पाई। पार्टी के विधायक के निधन के बाद रिक्त हुए जौरा सीट लूज करनी पड़ी ,किंतु किसी तरह ब्यावरा सीट पर अपनी जीत बरकरार रख पाए। भाजपा विधायक के निधन के बाद रिक्त हुए आगर सीट पर कब्जा जमा कर कांग्रेस भले ही खुश हो सकती है, किंतु सरकार बनाने के लिए आवश्यक जादुई आंकड़े 115 के आसपास भी नहीं पहुंच पाने के कारण पार्टी नेताओं को अपने संगठन की मजबूती और भविष्य की चुनावी रणनीति में आमूलचूल परिवर्तन करने की जरूरत पड़ सकती है।

 इसके लिए पार्टी के प्रदेश नेतृत्व में युवा खेवनहार की दरकार हो सकती है। आज भोपाल में हुई कांग्रेस विधायक दल, चुनाव प्रभारियों और उप चुनाव क्षेत्र वाले जिला अध्यक्षों  की बैठक में अंदर खाने में इस तरह के विचार सामने आए हैं। वैसे अनुभव के मामले में प्रदेश में कांग्रेस के पास कमलनाथ ,दिग्विजय सिंह, सुरेश पचौरी , कांतिलाल भूरिया,अजय सिंह और राजमणि पटेल जैसे अनुभवी नेता है। पूरे प्रदेश में इन सब की स्वीकार्यता पर भी कोई संदेह नहीं है ,किंतु युवा और ऊर्जावान नेतृत्व की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।यदि इस पर गंभीरता से विचार होता है तो पूर्व मंत्री जीतू पटवारी, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव, पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह, सांसद नकुल नाथ, हनी बघेल ,उमंग सिंगार और ओमकार सिंह मरकाम जैसे नामों का उल्लेख आ सकता है।

जीतू पटवारी वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष होने के साथ ही मीडिया विभाग के अध्यक्ष भी हैं। अपने आक्रामक तेवर के लिए जाने जाने वाले पटवारी के सीधे संपर्क पार्टी के राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी से भी है इसलिए पूरे प्रदेश में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच उनकी भूमिका बेहतर साबित हो सकती है। पूर्व केंद्रीय मंत्री के साथ ही पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभाल चुके अरुण यादव को अनुभव के साथ ही युवा नेतृत्व के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। वैसे भी उन्होंने कमलनाथ के प्रदेश अध्यक्ष बनने के पूर्व पूरे 4 साल तक पूरे प्रदेश में कांग्रेस को सक्रिय रखने में महति भूमिका निभाकर 2018 में सरकार बनाने की पृष्ठभूमि तैयार की थी। लेकिन उनके दो समर्थक विधायकों के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने से उनकी वजनदारी  में कमी आई है।

कमलनाथ सरकार में मंत्री के रूप में और हाल ही में उपचुनाव के दौरान जयवर्धन सिंह मे भी नेतृत्व क्षमता के स्पष्ट संकेत मिले हैं किंतु उनके पिता दिग्विजय सिंह की मौजूदगी में कांग्रेस उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे इसकी संभावना कम ही है। युवा नेतृत्व की कमान संभालने को लेकर व्यक्त किए गए विचार के बाद मध्य प्रदेश के एकमात्र लोकसभा सांसद नकुल नाथ को अन्य सक्रीय  युवा नेताओं ने भले ही कटघरे में खड़े करने का प्रयास किया था किंतु पिता से मिले राजनीतिक विरासत की वजह से उनके नाम पर भी विचार किया जा सकता है।

प्रदेश में अनुसूचित जाति की बड़ी संख्या को देखते हुए कांग्रेस में समय-समय पर इस वर्ग के नेतृत्व को लेकर भी चर्चा होती रही है । मौजूदा परिस्थितियों में पूर्व मंत्री हनी बघेल ,उमंग सिंगार और ओमकार सिंह मरकाम में ऐसी क्षमता दिखाई देती है और न सिर्फ आदिवासियों में बल्कि प्रदेश के कई हिस्से में उन्हें बेहतर सफलता मिल सकती है। ऐसी दशा में यदि मध्य प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाओं को बल मिलता है तो इन नामों पर विचार किया जा सकता है।

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