राजनीति

असम, बंगाल में बिहार चुनाव के नतीजे तय करेंगे कांग्रेस की रणनीति

नई दिल्ली 
बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम में अब बेहद कम वक्त बचा है। मंगलवार दोपहर तक तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी। इस चुनाव के नतीजे कई मायनों में बेहद अहम साबित होंगे। यह चुनाव भविष्य में बंगाल और असम में कांग्रेस की रणनीति तय करेंगे। इस चुनाव में पार्टी ने कई प्रयोग किए हैं, जिनका चुनावी राजनीति पर असर का आकलन परिणाम के बाद ही होगा। 

2014 के लोकसभा चुनाव में शर्मनाक हार के बाद कांग्रेस ने अपनी छवि बदलने की कोशिश की। गुजरात विधानसभा चुनाव में मुसलमान पार्टी के एजेंडे से बाहर रही। इसके बाद हुए कई दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस मुसलमानों से जुड़े मुद्दों पर दूरी बनाती हुई नजर आई। हालांकि, 2019 के चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया।

बिहार चुनाव में कांग्रेस ने अपने परंपरागत वोट बैंक सवर्ण, मुस्लिम और दलित पर फोकस किया। वहीं, धुव्रीकरण के डर से पार्टी ने मुस्लिम मुद्दों को नहीं छोड़ा। चुनाव से ठीक पहले यूपी में डॉ कफील खान की रिहाई के लिए चलाई गई मुहिम हो या बिहार में जिन्ना विवाद से जुड़े मशकूर अहमद उस्मानी को टिकट देना। इसके साथ कई मुस्लिम प्रचारकों को भी मैदान में उतारा है।

चुनाव प्रचार के दौरान कई बार धुव्रीकरण से जुड़े बयान आए, पर इसका चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ा। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी के निदेशक डॉ संजय कुमार कहते हैं ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि राजद और कांग्रेस ने पहले ही चुनाव का एजेंडा तय कर दिया था। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान दोनों पार्टियों ने प्रचार को रोजगार पर केंद्रित रखा।

असम में कांग्रेस इस बार मौलाना बदरुद्दीन अजमल की यूडीएफ के साथ चुनावी गठबंधन की तैयारी कर रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने यूडीएफ के साथ यह कहते हुए गठबंधन ने इनकार कर दिया था कि इससे भाजपा को सांप्रदायिक धुव्रीकरण करने में आसानी होगी। इस बार पार्टी यूडीएफ और दूसरी पार्टियों के साथ चुनाव लड़ने के लिए तैयार है।

भाजपा अभी से हमलावर
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को मुस्लिम मतदाताओं को नजरअंदाज करना आसान नहीं है, क्योंकि मुर्शिदाबाद और मालदा पार्टी का गढ़ माना जाता है। इन जिलों में मुस्लिम मतदाताओं की तादाद अच्छी खासी है। वहीं, भाजपा अभी से हमलावर है। बिहार में गठबंधन जीतता है, तो इससे कांग्रेस का सांप्रदायिक धुव्रीकरण का डर कम होगा।

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